दिल्ली की हार की कई वजहों का मूलांकन हो रहा है। कुछ लोगों का मानना है की भजपा की नकारात्मक चुनाव अभियान ने जनता हो क्षुब्ध कर दिया । नकारात्मकता का ऐसा खामियाज़ा तो भारत के किसी चुनाव में नहीं दिखा पर कुछ लोग ये ज़रूर सोचते हैं की किरण बेदी का प्रभाव दिल्ली की जनता पर ऐसा नहीं पड़ा जैसा अमित शाह चाहते होंगे । बहरहाल कारण जो भी हो, दिल्ली मे केजरीवाल की झाड़ू ने सारे दलों का सूपड़ा साफ़ कर दिया और केजरीवाल को एक मौका और देदिया अपनी गलतियां सुधरने का।
ध्यान से सोचा जाए तो केजरीवाल का आना भाजपा के लिए अच्छा भी है । कुछ दिनों तक केजरीवाल नायक होंगें और मीडिया का प्राइम टाइम केजरीवाल पर केंद्रित होगा। केजरीवाल भी मीडिया लोलुपता मे खूब साथ देंगे । फिर कुछ दिन दिल्ली के मंत्री मंडल पर केंद्रित होंगे । क्योंकि केजरीवाल ने नाना प्रकार के वादे कर डाले हैं, इसलिए अब उनके पास हनीमून पीरियड नहीं होगा। लोकपाल, वैट, मुफ्त बिजली और पानी, वाय - फय, हेल्थ हॉटलाइन इत्यादि । मीडिया इसे रोज़ का मुद्दा बना देगी और देश का ध्यान दिल्ली पे केंद्रित हो जाएगा । केजरीवाल भी सारा मामला केंद्र पे डालने का प्रयास करते रहेंगे जैसे सारे राज्य करते हैं । हो सकता है धरने पर भी बैठ जाएँ । इसी सब नाट्यक्रम मे मोदी सरकार रहत की सांस लेगी और अपने आप पर से रोज़ रोज़ की बहस को बचा लेगी और कुछ अलोकप्रिय रिफॉर्म्स पास करा लेगी जैसे विनिवेश (पी एस यू ), सक्त बजट इतियदि । इससे देश का वित्तीय घाटा कम होगा।
मीडिया की नज़रों से बचकर अब संघ यूपी और बिहार मे अपना खेल सुचारू रूप से चलाएगा । यूपी और बिहार की जीत के साथ भाजपा सारे उत्तरी भारत पर एकछत्र राज कर सकेगी जो स्वतंत्र भारत मे दशकों बाद होगा । इससे अमित शाह, मोदी और जेठली न केवल भारत के सबसे ताकतवर नेता बन जाएंगे बल्कि राज्य सभा मे भाजपा का बहुमत स्थपित कर लेंगे ।
ये सभी जानतें हैं की भाजपा अगर दिल्ली जीत भी लेती फिर भी वो एक सिरदर्द ही होता। ऐसा इसलिए क्योंकि दिल्ली की जनता न केवल वादो को लेकर उतावली है बल्कि भाजपा का दिल्ली कैडर असंगठित और विभाजित है और भाजपा को अपने ही वादे पूरे करने में मुश्किल होती । हर वादा खिलाफी नरेंद्र मोदी पर जा कर रुकता और पार्टी को इसका खामियाज़ा आने वाले हर चुनाव मे उठाना पड़ता ।
ये सब एक कयास भी हो सकता है पर कुछ ऐसे तार हो सकते हैं जो इन कयासों की वैद्यता पर रौशनी डाले। क्योंकि भाजपा एक संगति पार्टी है तो ये जानना ज़रूरी है की निम्न बिंदु क्या सिर्फ एक हादसा मात्र हैं या सोची समझी रणनीति :
१) भाजपा ने किरण बेदी को बलि का बकरा नियुक्त किया क्योंकि वे जानते थे की हार पक्की है। हार का सारा इलज़ाम बेदी पर मड दिया जाएगा। नरेंद्र मोदी पर से ध्यान हटा कर बेदी को इस्तेमाल किया जाए ।
२) सतीश उपाध्या का मीटर विवाद की जानकारी आप पार्टी को भाजपा के किसी अंदरूनी ने दी जिससे पार्टी की दिल्ली यूनिट में विभाजन हो सका और अमित शाह को कमान संभालनी पड़ी
३) भाजपा की प्रत्याशी सूची जारी करने में अभूतपूर्व देरी । यहाँ तक की वर्त्तमान MLA को भी टिकट की गारंटी नहीं दी गयी और ऐसा तब भाजपा जानती थी की आप ने प्रत्याशी महीनो पहले घोषित कर दिए हैं
४) भाजपा का मेनिफेस्टो जारी न करना और सिर्फ विज़न पत्र लाना वो भी अंत समय पर। जबकि भाजपा का संगठन इन चीज़ों के प्रबंधन का माना हुआ खिलाडी है।
५) भाजपा की कई, जनवरी की, दिग्गज रैलियों का रद्द होना (और सबका कारण पुलिस क्लीयरेंस न होना )
क्या भाजपा हार के जितने वाली बाज़ीगर बन पाएगी या अपने ही जाल में फस जायेगी ?
अगर ये रणनीति थी तो अब ये देखना है की ये कितनी सफल होगी और अगर ये मात्र दिल्ली-भाजपा का अप्रबंधन था तो भाजपा को इसे भविष्य में दोहराना मंहगा पड़ेगा ।